उत्सव · गीतांजलि

गीतांजलि पर कविता

हो तुम स्वयं गीतों की अंजलि,कोई क्या लिखे गीत तुम पर।है सबसे अनोखे अन्दाज तुम्हारे,आत्मविश्वास से भरपूर हो तुम।कितना निश्चल, कितना चंचल, कितना प्यारा था बचपन तुम्हारा;दादी, नानी, मां की व सबकी राजदुलारी थी तुम,भोली भाली बातों से सबका मन मोह लेती थी तुम।नृत्य संगीत कला में हो निपुण तुम,शिक्षा ही सबसे बड़ा वरदान तुम्हारा,अनेक उपलब्धियां प्राप्त की तुमने,अथक परिश्रम का है परिणाम तुम्हाराप्रेम से, मधुर भाव से सभी संबंधों को स्वीकारती हो तुम,मन खिल उठता है जब मिलती हो तुम,व्यक्तित्व प्रभावशाली है तुम्हारा,हंसना-हंसाना है कला तुम्हारी,प्रशंसनीय उदारता और दृढ़ संकल्प है तुम्हारा,सर्वगुणसम्पन्न, कर्तव्यपरायणता, सकारात्मकता से सम्पन्न हो तुम,असीम प्यार पाने की हकदार हो तुम,परिवार का अभिमान हो तुमज़िन्दगी ने चाहे कितने रंग बदले, धैर्य नहीं खोया तुमने,प्यार और सम्मान से मधुर गीत गाती रही तुम,हंसते गाते नित्य निरन्तर, सबका मन हर्षाते जाना।यही शुभ कामना है हमारी।

सूक्ष्म भुआ

23 नवंबर 2022