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चिंतनReflection

ईश्वर का अस्तित्व

हे स्नेह और करुणा के आराध्यदेव,तुम्हें नमस्कार है, नमस्कार है,तुम सच्चिदानन्दघन हो,तुम सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हो,तुम सबके अन्तर्वासी हो।

गए लोग और बीता समय कभी वापिस नहीं आता, रह जाती हैं यादें। उन यादगार पलों में याद आता है वह पल जब हम बचपन में सपरिवार सहित पूजा करते थे। कभी गायत्री मन्त्र, फिर आरती और अन्त में प्रार्थना करते थे कि हे प्रभु हमारा हृदय दिव्य गुणों से पूर्ण हो। भगवान सर्वव्यापक, सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान हैं। इसमें सन्देह नहीं है वह शक्ति तो सम्पूर्ण सृष्टि को सुचालित रूप से संचालित कर रही है। उसकी उपस्थिति पर प्रश्नचिन्ह नहीं लग सकता। सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहों का अपने निश्चित कक्ष पर घूमना और परिणामस्वरूप काल और ऋतुओं में निरन्तर परिवर्तन तो हम देखते ही हैं।

बीज से वृक्ष की उत्पत्ति एवं इसी प्रकार मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट पतंगों की रचना भी आश्चर्यचकित करने वाले प्रत्यक्ष अनुभव हैं। इसी प्रकार हमारे जीवन में प्रत्येक घटना का होना भी ईश्वरीय शक्ति का प्रमाण है। हम केवल द्रष्टामात्र हैं, ईश्वर ही कर्त्ता है। अर्थात जगत का आधार ही भगवान हैं। वे जगत के कण कण में व्यापक हैं। उनके बिना किसी बात का अस्तित्व ही नहीं है। वे सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं। वे स्वयं प्रकाश हैं। सारे नाम रूपों का आधार हैं। वे एकमेवद्वितीय हैं। उनकी महिमा अनिवर्चनीय हैं। वे सारे ज्ञान विज्ञान तथा ऐश्वर्य का मूल हैं। यद्यपि हम छोटे थे इसलिए गहराई में इसका मतलब नहीं जानते थे तथापि यह अनुभव करते थे कि उनके नाम में बहुत शक्ति है। उनका पावन नाम लेते ही एक अजीब उत्साह और शक्ति का संचार होता है। इसके अतिरिक्त सप्ताह में एक दिन पूर्णमदः… इस शान्तिमन्त्र का भी अर्थ-सहित उच्चारण करते थे।

समय अपनी गति से बीतता गया, आध्यात्मिकता में बहुत रुचि थी। घर का वातावरण भक्तिमय था। माता जी का प्रतिदिन गुरुग्रन्थ साहिब पढ़ना, पिताजी अपनी नियमित दिनचर्या के बाद रामायण और गीता के श्लोकों का अध्ययन करते थे। समय समय पर उनका सन्तों के प्रवचन सुनने के रामलीला ग्राउंड जाना। इस प्रकार हमारे बचपन को अच्छे संस्कारों की नींव मिली। इसके अतिरिक्त जब कोई कार्य शुरू करते तो उसकी सफलता के लिए मेहनत करते और अन्त में उसकी सिद्धि के लिए 100 (शत्) हनुमान चालीसा पढ़ते। इस प्रकार भगवान में अटूट विश्वास और श्रद्धा थी। सुख-दुख भी जीवन में चलते रहते हैं। संकट की घड़ी का निवारण के लिए शीश गंज गुरुद्वारा 40 दिन के लिए जाना। इस प्रकार आलौकिक दिव्य शक्ति का अनुभव करते थे।

विद्यालय शिक्षा के बाद कालेज शिक्षा का आरम्भ हुआ। जब एम. ए. की कक्षा में प्रवेश करना था तब पिता जी ने एम. ए. संस्कृत में करने का सुझाव दिया। मुझे उनका सुझाव बहुत पसन्द आया। मैंने हंसराज कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से किया। उपनिषद पढ़ने का अवसर मिला।

जीवन संघर्षमय है। हमें पग पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। हम हर समय दीन बनकर प्रभु के चरणकमलों की शरण लेते हैं। प्रभु से आतुर वाणी से अपने कल्याण की रक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं। प्रभु हमारी पुकार सुनकर दौड़े आते हैं और हमारी रक्षा करते हैं। यह उनकी कम कृपा नहीं है। हमारे निराश मन में आशा का संचार करते हैं, नवीन स्फूर्ति, उत्साह देते हैं।

इतिहास में ध्रुव, प्रह्लाद, गजेन्द्र इत्यादि कहानियां कम प्रसिद्ध नहीं है। जहाँ भगवान ने स्वयं अपने भक्तों की रक्षा की।

तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो,तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्हीं हो,तुम्हीं हो साथी तुम्हीं सहारे,कोई न अपना सिवा तुम्हारे,दया की दृष्टि सदा ही रखना,तुम्हीं हो बन्धु सखा तुम्हीं हो।

दादी के हाथ सेIn Dadi's handwriting

ईश्वर का अस्तित्व, पन्ना 1ईश्वर का अस्तित्व, पन्ना 2ईश्वर का अस्तित्व, पन्ना 3

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