उत्सव · मिहिकाCelebration · Mihika
सरला जी की नन्ही पोती
मिहिका, अभी तक कोहरे में ही अदृश्य थी तुम,परी बनकर आई हो हमारे घर आँगन में तुम,हजारों मील दूर रहकर भी हृदय में बस गई हो तुम,जब से देखी मनमोहिनी छवि तुम्हारी,सर्वस्व न्योछावर हुआ मेरा मन निहार कर तुम्हें,मैं हर्षित और आनन्दित हुई देख तुम्हें,मेरे मन में मङ्गलमय बधावे बजने लगे,आनन्द, उमंग, उल्लास से भरकर बोली मैं सखियों सेबधाई के गीत गाओ सब तुम,दादू दादी की दुलारी और रूह हो तुम,मम्मी पापा की परी और आँखों का नूर हो तुम,ईश्वर की अनमोल कृति हो तुम,स्वर्गीय आनन्द देती हो तुम,उस दिव्य लोक से उतरी हो तुम,बरखा की पहली सुगन्धित फुहार हो तुम,ओंस की एक बूंद हो तुम,मन करता है हरपल पलकों पर रखू तुम्हे,मेरे आँगन में फैला उजाला हो तुम,देखकर तुम्हें मन नहीं भरता चाहे देखूँ हज़ार बार तुम्हे,घर की रौनक और दादी की आँखों का तारा हो तुम,मिहिका महकाती रही सदा घर-आँगन हमारा तुम,स्वस्थ, स्नेहपूर्ण, समृद्ध और प्रगतिशील रहकर हमारा सम्मान बढ़ाना तुम,यही आशीर्वाद और कामना है हमारी।